योगी के गढ़ मेंठोकेंगे ताल: सुनील सिंह

Gorakhpur Express News.Com योगी आदित्यनाथ को पिछले उपचुनाव में गोरखपुर से मिली हार के चलते पूरे देश में भाजपा के लिए सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली सीट अब पार्टी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए सबसे अधिक चिंता की सीट बन गई है, आख़िरकार उपेंद्र दत्त शुक्ल को उम्मीदवार बनाया गया जो उस समय भाजपा के क्षेत्रीय अध्यक्ष थे. हालांकि एक खांटी कार्यकर्ता को उम्मीदवर बनाया गया था लेकिन गोरखपुर में यह चर्चा बन गई कि उपेंद्र, योगी आदित्यनाथ की पसंद नहीं हैं, योगी की कई जनसभाएं और उनके यह कहने के बावजूद कि चुनाव उपेंद्र नहीं वह ख़ुद लड़ रहे हैं, भाजपा कार्यकर्ताओं, समर्थकों में उत्साह पैदा नहीं कर सकी. मतदान प्रतिशत कम हुआ, भाजपा पांच विधानसभा वाले गोरखपुर संसदीय क्षेत्र के तीन विधानसभा क्षेत्रों में हारी. गोरखपुर सदर और पिपराइच से ही उसे बढ़त मिल पाई. हमेशा निर्णायक बढ़त देने वाले गोरखपुर शहर विधानसभा क्षेत्र से भी बढ़त कम हुई, भाजपा की ओर से हार के कारणों में मतदान प्रतिशत का कम होना, जीत के प्रति अति आत्मविश्वास के कारण गिनाए गए लेकिन आंतरिक विश्लेषण में पाया गया कि योगी की सीट पर ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे जाने से क्षत्रिय उदासीन हो गए और वोट देने नहीं गए, हालांकि अनुमान के विपरीत उपेंद्र के चुनाव लड़ने की वजह से ब्राह्मणों ने भाजपा को वोट दिया जबकि अब तक के चुनाव में वे इस सीट पर भाजपा से दूर रहते थे. इसका कारण गोरखपुर में ठाकुरों और ब्राह्मणों के बीच पुरानी राजनीतिक अदावत है, योगी आदित्यनाथ द्वारा खुलकर ठाकुर लॉबी का नेतृत्व करने से ब्राह्मण उन्हें वोट नहीं करते थे. यही कारण है कि बसपा ने 2009 के चुनाव में इस सीट पर ब्राह्मण और मुसलमान का समीकरण बिठाने के लिए पूर्वांचल के दिग्गज ब्राह्मण नेता हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी को यहां से चुनाव लड़ाया लेकिन सपा ने भोजपुरी अभिनेता व गायक मनोज तिवारी को चुनाव लड़ाकर इस समीकरण को बिगाड़ दिया, उस समय चर्चा थी कि योगी आदित्यनाथ को राहत देने के लिए अमर सिंह ने सपा से मनोज तिवारी को चुनाव लड़वाया है, उपचुनाव में हार का दूसरा सबसे बड़ा कारण था निषादों का भाजपा से दूर हो जाना. वर्ष 2016 में निषाद पार्टी बन गई थी और वह धीरे-धीरे अपना आधार बढ़ा रही थी. तब उसकी बढ़ती ताक़त को भाजपा ने नज़रअंदाज़ किया, यही नहीं भाजपा ने इस इलाके के सभी बड़े निषाद नेताओं की भी अनदेखी की जबकि इस सीट पर निषाद मतदाताओं की संख्या 3 लाख से अधिक मानी जाती है, वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में गोरखपुर ग्रामीण सीट से दिग्गज निषाद नेता रामभुआल निषाद को भाजपा से टिकट काट देना योगी आदित्यनाथ की एक ऐसी गलती थी जो 2018 के लोकसभा उपचुनाव में भाजपा की हार की पृष्ठिभूमि बनी, उनका टिकट कटने से निषादों में यह संदेश गया कि योगी आदित्यनाथ निषाद नेताओं की उपेक्षा कर रहे हैं. सपा ने तुरंत मौका लपक लिया और रामभुआल निषाद को पार्टी में शामिल कर उन्हें चिल्लूपार से टिकट दे दिया, सपा ने दूसरा दांव तब मारा जब उपचुनाव में निषाद पार्टी से गठबंधन कर निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद को उम्मीदवार बना दिया. बसपा द्वारा प्रत्याशी घोषित नहीं किए जाने और सपा प्रत्याशी को समर्थन देने से दलित मतदाता भी प्रवीण निषाद के पक्ष में आ गए, भाजपा को अपनी ग़लती का एहसास हुआ और उसने पूर्व विधायक जय प्रकाश निषाद व कुछ अन्य नेताओं को भाजपा में शामिल किया लेकिन तब तक देर हो चुकी थी, भाजपा के विरोध में पहली बार सपा-बसपा एक साथ आए और परिणामस्वरूप दलित, मुसलमान, निषाद, यादव मतदाता भी एकजुट हुए. नतीजा अपराजेय माने जाने वाली गोरखपुर सीट पर भाजपा की पराजय हुई, एक वर्ष बाद ही उपचुनाव में बने समीकरण अब बदल गए हैं. भाजपा को हराने वाले प्रवीण निषाद अब ख़ुद भाजपा में शामिल हो गए हैं. उनके पिता डॉ. संजय निषाद ने निषाद पार्टी का भाजपा से गठबंधन कर लिया है, इस राजनीतिक घटनाक्रम के पहले सपा की पूर्व विधायक राजमती निषाद अपने बेटे अमरेंद्र निषाद के साथ भाजपा में शामिल हो गई थीं, इस तरह भाजपा निषाद नेताओं को अपने पक्ष में लाने में क़ामयाब हुई है लेकिन वह किसे प्रत्याशी बनाए यह बड़ी गुत्थी बनी हुई है. यदि वह प्रवीण निषाद को प्रत्याशी बनाती है तो अमरेंद्र निषाद नाराज़ हो जाएंगे क्योंकि उन्हें प्रत्याशी बनाने का वादा किया गया है, यदि अमरेंद्र को प्रत्याशी बनाया जाता है तो निषाद पार्टी के असंतुष्ट होने का ख़तरा है. यदि अमरेंद्र और प्रवीण दोनों को प्रत्याशी नहीं बनाया जाता है तो निषादों में यह संदेश जाएगा कि भाजपा ने एक बार फिर उनके साथ धोखा किया है. तब निषाद पार्टी के भाजपा के साथ रहने के बावजूद अधिकतर निषाद मतदाता सपा प्रत्याशी रामभुआल निषाद के पक्ष में जा सकते हैं, यदि उपेंद्र दत्त शुक्ल की जगह दूसरे को टिकट दिया जाता है तो ब्राह्मण मतों की नाराज़गी का ख़तरा है. यदि उपेंद्र को फिर प्रत्याशी बनाया जाता है तो क्षत्रियों में नाराज़गी होगी क्योंकि वे गोरखपुर की सीट को अपनी सीट मानते हैं और चाहते हैं कि यहां से कोई क्षत्रिय नेता ही लड़े, वैसे भी गोरखपुर के ठाकुर इस बात से दुखी हैं कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री होने के बावजूद उनका बोलबाला नहीं है. पिछले लोकसभा चुनाव में गोरखपुर मंडल की नौ सीटों में से सिर्फ़ दो गोरखपुर व डुमरियांगज पर क्षत्रिय उम्मीदवारों को टिकट मिला था जबकि चार ब्राह्मण उम्मीदवार को चुनाव लड़ाया गया, अब तक घोषित छह सीटों में से दो स्थानों पर ब्राह्मण उम्मीदवार दिए गए हैं. संतकबीरनगर और देवरिया से भी ब्राह्मण उम्मीदवार ही उतारे जाने की संभावना है, संतकबीरनगर के जूता कांड ने उनके दुख को और बढ़ाया है. योगी के कभी क़रीबी रहे हिंदू युवा वाहिनी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुनील सिंह का चुनाव लड़ना भाजपा का सिरदर्द और बढ़ा रहा है, इस तरह भाजपा को एक साथ क्षत्रिय, ब्राह्मण, निषाद, सैंथवार जातियों के संतुलन को साधना है. गोरखपुर संसदीय क्षेत्र में सैंथवारों की संख्या भी अच्छी-ख़ासी है. वे भाजपा समर्थक माने जाते हैं लेकिन भाजपा में पर्याप्त महत्व नहीं मिलने से दुखी हैं, वर्ष 2017 के चुनाव में कई सैंथवार नेता भाजपा से बगावत कर चुनाव में खड़े हो गए थे जिन्हें मनाने में अच्छी-ख़ासी मुश्किल हुई थी, भाजपा की ओर से टिकट के जितने दावेदार हैं, उनमें एक भी ऐसा नहीं है जो जातिगत संतुलन साध सके. यदि ख़ुद योगी आदित्यनाथ उम्मीदवार बनते हैं तभी इस संतुलन को बनाया जा सकता है, योगी आदित्यनाथ को ख़ुद चुनाव लड़ने में दिक्कत यह है कि उन्हें पूरे देश में प्रचार करने के लिए वक़्त कम हो जाएगा. उन्हें गोरखपुर में बहुत ज़्यादा समय देना पड़ेगा. गोरखपुर से चुनाव लड़ने पर प्रदेश की राजनीति से दूर होने का भी ख़तरा है जो उन्हें शायद ही मंज़ूर हो, ये सब हालात गोरखपुर में भाजपा के लिए एक योग्य उम्मीदवार की तलाश में बाधा हैं. देखना है कि इन बाधाओं से भाजपा कैसे पार पाती है।